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-चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस सोमवार को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया। इसमें कहा गया है कि नोटिस में चीफ जस्टिस पर लगाए गए आरोपों को मीडिया के सामने उजागर किया गया, जो संसदीय गरिमा के खिलाफ है। साथ ही कहा गया है कि उन्होंने तमाम कानूनविदों से चर्चा के बाद पाया कि यह प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है। बता दें कि इस नोटिस पर विपक्ष के 64 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे और उन्हें हटाने के लिए 5 वजहों को आधार बनाया था।
उपराष्ट्रपति ने नोटिस खारिज करने की ये वजह गिनाईं
1) सांसदों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नोटिस में बताए गए सीजेआई के खिलाफ आरोपों को सार्वजनिक किया। ये संसदीय गरिमा के खिलाफ है। ये अनुचित है और सीजेआई के पद की अहमियत कम करने वाला कदम है। मीडिया में बयानबाजी से माहौल खराब होता है।
2) नोटिस उचित तरीके से नहीं दिया गया है। किसी के महज विचारों के आधार पर हम गवर्नेंस के किसी स्तंभ को कमजोर नहीं होने दे सकते। चीफ जस्टिस की अक्षमता या उनके द्वारा पद के दुरुपयोग के आरोप को साबित करने के लिए विश्वसनीय और सत्यापित करने योग्य जानकारी होनी चाहिए।
3) सांसदों ने जो भी आरोप लगाए हैं उनमें कोई ठोस सबूत और बयान नहीं दिए गए। नोटिस में जो आरोप लगाए हैं, वो बुनियादी तौर पर न्यायपालिका की आंतरिक प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। ऐसे में इन पर आगे जांच की जरूरत नहीं है।
4) सभी पांच आरोपों पर गौर करने के बाद ये पाया गया कि ये सुप्रीम कोर्ट का अंदरूनी मसला है। ऐसे में महाभियोग के लिए ये आरोप स्वीकार नहीं किए जा सकते।
5) सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने अपने आदेश में ये साफ कहा है की चीफ जस्टिस ही मास्टर ऑफ रोस्टर हैं और वे ही तय कर सकते हैं कि मामला किसके पास भेजा जा सकता है।
सभापति ने चीफ जस्टिस को छोड़कर हर वर्ग से की बात
– सभापति एम वेंकैया नायडू ने अपने 10 पेज के फैसले में बताया कि विपक्षी दलों के नोटिस को अस्वीकार करने से पहले उन्होंने कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों, लोकसभा और राज्यसभा के पूर्व महासचिवों, पूर्व विधिक अधिकारियों, विधि आयोग के सदस्यों और न्यायविदों से सलाह-मशविरा किया।

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